
असम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने शुक्रवार को दावा किया कि मणिपुर जैसे दूरस्थ क्षेत्रों से लोग असम में जमीन पर कब्जा करने आ रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार अवैध कब्जे वाली सभी जमीनों, विशेष रूप से वन भूमि को मुक्त कराने के लिए प्रतिबद्ध है। सरमा ने बताया कि इन कब्जों में एक खास षड्यंत्र है जहां पहले कुछ लोग आकर खेती शुरू करते हैं और फिर दूसरों को लाकर बड़े पैमाने पर अवैध बस्तियां बसाते हैं।
लखीमपुर में हाल ही में हुई बेदखली कार्रवाई का जिक्र करते हुए सरमा ने कहा कि वहां मणिपुर और असम के नगांव से 12 परिवार पहुंचे थे। उन्होंने कहा, “शायद उन्हें पहले के कब्जेदारों ने बुलाया था लेकिन उन्हें नहीं पता था कि बेदखली हो चुकी है।” जिला आयुक्त इन परिवारों को वापस भेजेगा। सरमा ने यह भी दावा किया कि कई कब्जेदार गोलपारा जैसे नजदीकी जिलों से होने का दावा करते हैं लेकिन वे मूल रूप से पश्चिम बंगाल या बांग्लादेश से हो सकते हैं। उन्होंने बताया कि हाल ही में 16 अवैध बांग्लादेशियों को पकड़ा गया है।
कब्जे का एक खास पैटर्न
मुख्यमंत्री ने कहा कि कब्जे का एक खास पैटर्न है। उदाहरण के तौर पर लुमडिंग में अदरक की खेती, उरियामघाट में सुपारी की खेती और श्रीभूमि व हेलाकांडी में रबड़ के बागान देखे गए हैं। उरियामघाट में प्रस्तावित बेदखली के लिए चार-पांच महीने लगेंगे क्योंकि यह नगालैंड की सीमा से सटा क्षेत्र है और कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा। उन्होंने बताया कि उरियामघाट में हजारों बीघा जमीन पर 500 परिवारों ने कब्जा कर लिया है जो ज्यादातर मध्य असम के ढिंग और लाहोरीघाट क्षेत्रों से हैं।
जमीन को कब्जे से मुक्त कराया
सरमा ने मंगलवार को बताया था कि मई 2021 से उनकी सरकार ने 1,19,548 बीघा (160 वर्ग किमी) जमीन को कब्जे से मुक्त कराया है जिससे करीब 50,000 लोग प्रभावित हुए। उन्होंने कहा कि अभी भी 63 लाख बीघा जमीन, जिसमें 29 लाख बीघा वन भूमि शामिल है, कब्जे में है। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि अधिकांश कब्जेदार एक खास धर्म के लोग हैं जो असम की स्वदेशी आबादी के लिए खतरा बन रहे हैं।
