
Lalu Prasad Yadav
सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) प्रमुख और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव के खिलाफ सीबीआई के नौकरी के बदले जमीन मामले में ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही पर रोक लगाने से इनकार कर दिया। जस्टिस एम एम सुंदरेश और एन कोटिस्वर सिंह की बेंच ने दिल्ली हाई कोर्ट को लालू की याचिका, जिसमें सीबीआई की एफआईआर रद्द करने की मांग की गई है, पर जल्द सुनवाई करने का निर्देश दिया। कोर्ट ने लालू की स्वास्थ्य स्थिति को देखते हुए उन्हें ट्रायल कोर्ट में व्यक्तिगत पेशी से छूट भी दी।
लालू के वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए के तहत सीबीआई द्वारा पूर्व अनुमोदन न लिए जाने का हवाला देते हुए कार्यवाही पर रोक की मांग की। हालांकि, सीबीआई की ओर से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल एस वी राजू ने इसका विरोध करते हुए कहा कि इस मामले में किसी अनुमति की आवश्यकता नहीं थी। सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेश के खिलाफ अपील पर हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए कहा कि अंतिम फैसले के समय हाई कोर्ट के आदेश की टिप्पणियां आड़े नहीं आएंगी।
आखिर क्या है यह मामला
यह मामला 2004 से 2009 के बीच लालू प्रसाद के रेल मंत्री रहते हुए मध्य प्रदेश के जबलपुर स्थित भारतीय रेलवे के पश्चिम मध्य क्षेत्र में ग्रुप डी की नियुक्तियों से संबंधित है। आरोप है कि इन नियुक्तियों के बदले भर्ती किए गए व्यक्तियों ने लालू के परिवार या उनके सहयोगियों के नाम पर जमीन के टुकड़े उपहार में दिए या हस्तांतरित किए। लालू ने दिल्ली हाई कोर्ट में 2022, 2023 और 2024 में दायर सीबीआई की एफआईआर और तीन चार्जशीट रद्द करने की मांग की थी।
लालू ने याचिका में क्या कहा
लालू ने अपनी याचिका में दावा किया कि 2022 में दर्ज एफआईआर में 14 साल की देरी हुई जबकि सीबीआई ने पहले की जांच को बंद करते हुए क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की थी। उन्होंने इसे राजनीतिक प्रतिशोध और गैरकानूनी, प्रेरित जांच करार दिया जो उनके निष्पक्ष जांच के मौलिक अधिकार का उल्लंघन है। याचिका में कहा गया कि धारा 17ए के तहत अनिवार्य अनुमोदन के बिना शुरू की गई जांच शुरू से ही अवैध है।
