
बॉम्बे हाई कोर्ट ने शिवसेना नेता और पूर्व सांसद संजय निरुपम को मुंबई के एक डेवलपर के खिलाफ हाउसिंग जिहाद जैसे सांप्रदायिक बयान देने से रोक दिया है। यह आदेश चांदीवाला एंटरप्राइजेज की याचिका पर सुनवाई करते हुए जस्टिस आरआई चागला ने दिया, जिसमें कहा गया कि निरुपम के बयान मानहानिकारक और आधारहीन हैं। कोर्ट ने निरुपम को डेवलपर के खिलाफ कोई भी अपमानजनक या निंदात्मक बयान देने से तत्काल प्रभाव से रोक दिया।
निरुपम ने इस साल की शुरुआत में आरोप लगाया था कि मुस्लिम डेवलपर्स मुंबई के स्लम रिहैबिलिटेशन अथॉरिटी प्रोजेक्ट्स में हिंदू आवेदकों को खारिज कर रहे हैं और इसे हाउसिंग जिहाद करार दिया था। उन्होंने उपमुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे और एसआरए प्रमुख को पत्र लिखकर कार्रवाई की मांग भी की थी। चांदीवाला एंटरप्राइजेज ने इन आरोपों को निराधार और अपनी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाने वाला बताया। कोर्ट ने पाया कि शंकर सोसाइटी के 67 निवासियों में केवल सात मुस्लिम हैं, इसलिए निरुपम का यह दावा कि मुस्लिम डेवलपर्स और एसआरए अधिकारी किसी गुप्त अभियान में शामिल हैं, प्रथम दृष्टया पूरी तरह गलत है।
व्यवहार पर भी नाराजगी
कोर्ट ने निरुपम के व्यवहार पर भी नाराजगी जताई। पिछली सुनवाइयों में नोटिस सर्व किए जाने के बावजूद उनकी अनुपस्थिति और 19 अगस्त 2025 को उनके घर पर भेजे गए नोटिस को फाड़कर लौटाने की घटना को कोर्ट ने गंभीरता से लिया। जस्टिस चागला ने कहा कि यह व्यवहार कोर्ट की कार्यवाही के प्रति अनादर दर्शाता है। निरुपम के वकील ने जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा, लेकिन कोर्ट ने इसे ठुकरा दिया।
सार्वजनिक बयान देने से मना
कोर्ट ने अंतरिम आदेश में निरुपम को डेवलपर के खिलाफ कोई भी सार्वजनिक बयान देने से मना किया है और उन्हें जवाब दाखिल करने के लिए सीमित समय दिया है। यह मामला अब आगे की सुनवाई के लिए सूचीबद्ध है।
