नेपाल के विरोध प्रदर्शनों से भारत को लेना चाहिए सबक, शिवसेना के सामना में ऐसा क्यों लिखा गया

संपादकीय ने भारत की विदेश नीति की आलोचना की, जिसमें नेपाल के साथ संबंधों में कमी और चीन के साथ नेपाल के बढ़ते रिश्तों पर चिंता जताई गई।
uddhav thackeray

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सामना के संपादकीय में चेतावनी दी गई कि नेपाल में बेरोजगारी और आक्रोश से उपजी अशांति से भारत को सबक लेना चाहिए। संपादकीय में भारत में बेरोजगारी, लोकतंत्र का ह्रास और जाति-धर्म की राजनीति जैसे खतरनाक मुद्दों पर ध्यान दिलाया गया है। इसमें कहा गया कि 80 करोड़ लोग सरकारी राशन पर निर्भर हैं और लोकतंत्र के सभी स्तंभ कमजोर हो रहे हैं। नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों में भूख, बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के कारण हुए विद्रोहों का जिक्र करते हुए संपादकीय ने भारत की स्थिति पर चिंता जताई।

नेपाल में हाल के जेन जी विरोध प्रदर्शन, जो मुख्य रूप से युवाओं और छात्रों द्वारा शुरू किए गए, सरकार से जवाबदेही और पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं। 8 सितंबर को काठमांडू, पोखरा, बुटवल और बीरगंज जैसे शहरों में शुरू हुए ये प्रदर्शन सोशल मीडिया पर प्रतिबंध के बाद और तेज हो गए। प्रदर्शनकारियों ने भ्रष्टाचार और पक्षपात के खिलाफ आवाज उठाई। स्थिति बिगड़ने पर झड़पों में 19 लोगों की मौत और 500 लोग घायल हुए, जिसके बाद काठमांडू सहित कई शहरों में कर्फ्यू लगाया गया।

विदेश नीति की आलोचना

संपादकीय ने भारत की विदेश नीति की आलोचना की, जिसमें नेपाल के साथ संबंधों में कमी और चीन के साथ नेपाल के बढ़ते रिश्तों पर चिंता जताई गई। नेपाल के प्रधानमंत्री अब पहले चीन और फिर पाकिस्तान की यात्रा करते हैं, जो भारत की कूटनीतिक असफलता को दर्शाता है। नेपाल में सैकड़ों चीनी शिक्षक चीनी भाषा सिखा रहे हैं और नेपाल का रंग अब भगवा से लाल हो गया है, जिसे भारत रोक नहीं सका।

कालापानी और लिम्पियाधुरा पर दावा

नेपाल ने लिपुलेख पास, कालापानी और लिम्पियाधुरा पर दावा किया है, जिसे भारत ने ऐतिहासिक तथ्यों और सबूतों पर आधारित नहीं बताया। सामना के अनुसार, चीन के साथ नेपाल की नजदीकी ने उसे भारत के खिलाफ दावे करने के लिए प्रोत्साहित किया है। भारत के विदेश मंत्रालय ने नेपाल की स्थिति को देखते हुए भारतीय नागरिकों के लिए यात्रा सलाह जारी की है।

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