
समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय महासचिव और पूर्व मंत्री आजम खान को 23 महीने की कैद के बाद इलाहाबाद हाईकोर्ट से जमानत मिलने के बाद मंगलवार को सीतापुर जेल से रिहाई मिल गई। उनके बड़े बेटे अदीब और समर्थकों ने जेल पहुंचकर उनका स्वागत किया। हालांकि, यह रिहाई कितने दिनों की मेहमाननवाजी साबित होगी, यह सवाल सभी के मन में कौंध रहा है, क्योंकि आजम पर अभी भी 81 से अधिक मुकदमे लंबित हैं। योगी सरकार के सत्ता में आने के बाद आजम के खिलाफ कानूनी कार्रवाई तेज हो गई थी, जिसने उनकी राजनीतिक यात्रा को बुरी तरह प्रभावित किया।
आजम खान की गिरफ्तारी की कहानी 2020 से शुरू होती है, जब फरवरी में रामपुर में पहली बार उन्हें हिरासत में लिया गया और सुरक्षा कारणों से सीतापुर जेल भेज दिया गया। 27 महीने की जेल के बाद मई 2022 में जमानत पर रिहा हुए, लेकिन सवा साल ही बाहर रह सके। अक्टूबर 2023 में बेटे अब्दुल्ला आजम के फर्जी जन्म प्रमाण पत्र मामले में सात साल की सजा सुनाए जाने के बाद दोबारा जेल लौटना पड़ा। कुल 104 मुकदमों में से 93 रामपुर में ही दर्ज हैं, जो मुख्य रूप से मोहम्मद अली जौहर विश्वविद्यालय से जुड़े जमीन और राजस्व विवादों से संबंधित हैं। इनमें भैंस चोरी, बकरी चुराने जैसे छोटे से लेकर दस्तावेजों में हेराफेरी और लूटपाट जैसे गंभीर आरोप शामिल हैं।
104 मामलों में से 12 का फैसला
आजम पर कुल 104 मामलों में से 12 का फैसला हो चुका है, जिसमें आठ में बरी हुए हैं, जबकि चार में सजा मिली है। भड़काऊ भाषण मामले में तीन साल की सजा से उनकी विधायकी छिन गई, डुंगरपुर जमीन बेदखली में दस साल, मशीन चोरी में सात साल और सड़क अवरोध में दो साल की सजा का सामना करना पड़ा। पेंडिंग केसों में 59 मजिस्ट्रेट कोर्ट, 19 सेशन कोर्ट और तीन जिला अदालत में लंबित हैं। हाल ही में क्वालिटी बार की जमीन पर अवैध कब्जे के मामले में जमानत मिली, लेकिन पैनकार्ड-पासपोर्ट और अन्य हेराफेरी केसों में जल्द फैसला आने की संभावना से जेल की वापसी का डर बना हुआ है।
परिवार पर भी कानूनी शिकंजा कस रहा
आजम खान के परिवार पर भी कानूनी शिकंजा कस रहा है। बेटे अब्दुल्ला पर 43, पत्नी तंजीम फातिमा पर 35 और बड़े बेटे अदीब पर 20 मुकदमे दर्ज हैं। कुल मिलाकर करीब 200 मामले। 2017 के सियासी बदलाव के बाद आजम की तूती बोलने वाली राजनीति अब अदालती जंग में उलझ गई है। जमानत मिलने से राहत तो मिली, लेकिन कई मामलों की सुनवाई दहलीज पर होने से उनकी आगे की राह आसान नहीं दिख रही। समाजवादी पार्टी के लिए यह रिहाई एक अस्थायी सांस है, जबकि योगी सरकार की कानूनी रणनीति लगातार जारी है।
