UP Politics: सहयोगियों के सियासी खेल ने बढ़ाई भाजपा की टेंशन, सपा-बसपा को भी लग सकता है झटका

निषाद पार्टी, अपना दल और सुभासपा की एकजुटता ने सपा की 'पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक' (पीडीए) रणनीति और बसपा के पारंपरिक वोट बैंक के लिए चुनौती खड़ी कर दी है।
UP Politics: सहयोगियों के सियासी खेल ने बढ़ाई भाजपा की टेंशन, सपा-बसपा को भी लग सकता है झटका

उत्तर प्रदेश में 2026 के त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव से पहले एनडीए के सहयोगी दलों ने राजनीतिक हलचल तेज कर दी है। निषाद पार्टी के 10वें स्थापना दिवस समारोह में दिल्ली में अपना दल (एस) और सुभासपा के नेताओं की मौजूदगी ने नए जातीय समीकरणों के संकेत दिए हैं। निषाद पार्टी ने निषाद समाज के लिए अनुसूचित जाति (एससी) दर्जे की मांग दोहराकर कठोर मोलभाव का इशारा किया है, जबकि अपना दल और सुभासपा ने भी अपनी ताकत दिखाने की कोशिश की। इस एकजुटता ने भाजपा पर पंचायत और 2027 के विधानसभा चुनाव में अधिक हिस्सेदारी के लिए दबाव बढ़ा दिया है।

निषाद पार्टी, अपना दल और सुभासपा की एकजुटता ने सपा की ‘पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक’ (पीडीए) रणनीति और बसपा के पारंपरिक वोट बैंक के लिए चुनौती खड़ी कर दी है। निषाद पार्टी का निषाद समाज (30-35 सीटों पर प्रभाव), अपना दल का कुर्मी समाज (20-25 सीटों पर प्रभाव) और सुभासपा का राजभर समुदाय (15-20 सीटों पर प्रभाव) मिलकर भाजपा के लिए 80-90 विधानसभा सीटों पर मुश्किल पैदा कर सकता है, अगर ये दल अलग राह चुनते हैं। सपा के गैर-यादव ओबीसी समीकरण और बसपा के एससी वोट बैंक में सेंधमारी की आशंका भी बढ़ गई है।

सहयोगी दलों का अलग चुनाव लड़ने का ऐलान

निषाद पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष व मत्स्य मंत्री संजय निषाद और अपना दल के उपाध्यक्ष व प्राविधिक शिक्षा मंत्री आशीष पटेल पहले ही भाजपा के साथ असहजता जता चुके हैं। संजय निषाद ने कई मौकों पर नाराजगी व्यक्त की, जबकि आशीष पटेल ने अपनी पार्टी को कमजोर करने का आरोप लगाया। हालांकि, सुभासपा अध्यक्ष व पंचायती राज मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने अब तक खुलकर बयानबाजी से परहेज किया है। फिर भी, निषाद पार्टी के स्थापना दिवस समारोह में तीनों दलों की एकजुटता ने भविष्य की रणनीति का संकेत दे दिया। ये दल पंचायत चुनाव में अकेले उतरने की घोषणा कर चुके हैं, जो भाजपा के लिए चिंता का सबब है।

भाजपा पर बढ़ा गठबंधन का दबाव

अब तक भाजपा अपने सहयोगी दलों की मांगों को अलग-अलग समन्वय के जरिए संभालती रही है, लेकिन तीनों दलों की एकजुट मांगें गठबंधन की गतिशीलता को जटिल बना सकती हैं। इन दलों का अपनी-अपनी जातियों में मजबूत वोट बैंक भाजपा के लिए विधानसभा और पंचायत चुनावों में बढ़त दिलाने में मददगार रहा है। यदि ये दल एकसाथ अपनी शर्तें रखते हैं, तो भाजपा को गठबंधन में ज्यादा हिस्सेदारी देनी पड़ सकती है। आने वाले समय में ये समीकरण सपा और बसपा की रणनीतियों को भी प्रभावित करेंगे, जिससे उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत मिल रहे हैं।

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