मध्यप्रदेश के ओंकारेश्वर में हर शाम नर्मदा घाट पर दीपों की रोशनी एक अलग ही सुकून देती है। श्रद्धालु दूर-दूर से यहां आते हैं और मां नर्मदा की आरती के बाद दीपदान करते हैं। लेकिन अब इस दीपदान में एक बड़ा बदलाव देखने को मिल रहा है। पहले जहां लोग प्लास्टिक या अन्य हानिकारक सामग्री वाले दीपकों का उपयोग करते थे, वहीं अब आटे से बने दीपकों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है।
यह बदलाव सिर्फ परंपरा का नहीं, बल्कि सोच का भी है। आटे के दीपक पूरी तरह से प्राकृतिक होते हैं और पानी में घुल जाते हैं, जिससे नर्मदा नदी को कोई नुकसान नहीं होता। यही कारण है कि यह पहल अब पूरे क्षेत्र में चर्चा का विषय बन गई है और इसे नर्मदा संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
आटे के दीपकों से नर्मदा संरक्षण को मिली नई दिशा
नर्मदा नदी को मध्यप्रदेश की जीवनरेखा कहा जाता है। लेकिन बढ़ते प्रदूषण ने इस पवित्र नदी को भी प्रभावित किया है। दीपदान के दौरान इस्तेमाल होने वाले प्लास्टिक और रासायनिक पदार्थों से नदी की गुणवत्ता पर असर पड़ता था। इसी समस्या को देखते हुए ओंकारेश्वर में आटे के दीपकों की शुरुआत की गई।
आटे के दीपक पूरी तरह से जैविक होते हैं। जब ये पानी में जाते हैं, तो कुछ समय बाद घुल जाते हैं और मछलियों व अन्य जीवों के लिए नुकसानदायक नहीं होते। इससे नर्मदा संरक्षण का काम आसान हो गया है। स्थानीय लोग भी इस पहल को खुले दिल से अपना रहे हैं और अब धीरे-धीरे यह एक नई परंपरा बनती जा रही है।
महिलाओं के लिए रोजगार का नया रास्ता
इस पहल का सबसे बड़ा सकारात्मक असर महिलाओं पर पड़ा है। आटे के दीपक बनाने का काम गांव और शहर की कई महिलाओं को दिया गया है। पहले जो महिलाएं घर तक सीमित थीं, अब वे इस काम के जरिए अपनी आय बढ़ा रही हैं और आत्मनिर्भर बन रही हैं।
महिलाएं घर पर ही आटे के दीपक तैयार करती हैं और फिर इन्हें घाटों पर बेचा जाता है। इससे उन्हें नियमित आय मिल रही है। यह पहल महिलाओं के लिए सिर्फ रोजगार का साधन नहीं, बल्कि आत्मसम्मान का भी जरिया बन गई है। कई महिलाएं अब अपने परिवार की आर्थिक मदद कर रही हैं और अपने बच्चों की पढ़ाई में भी सहयोग कर पा रही हैं।
प्रशासन और स्थानीय लोगों की अहम भूमिका
इस पहल को सफल बनाने में प्रशासन और स्थानीय लोगों की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण रही है। प्रशासन ने लोगों को जागरूक करने के लिए कई अभियान चलाए और आटे के दीपकों को बढ़ावा दिया। वहीं स्थानीय लोगों ने भी इसे अपनाकर इस प्रयास को मजबूत बनाया।
घाटों पर अब दुकानदार भी आटे के दीपक ही बेच रहे हैं और प्लास्टिक या अन्य हानिकारक सामग्री का उपयोग कम हो गया है। इससे पूरे क्षेत्र में एक सकारात्मक बदलाव देखने को मिल रहा है।






