ओडिशा के बाणपुर में पंचूडोला महोत्सव प्रारंभ, 388 साल पुराने उत्सव में निकलेगी 80 मंदिरों के देवताओं की पालकी यात्रा

इस उत्सव में देवताओं की सजी हुई पालकियों की शोभायात्रा निकलती हैं और यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु भाग लेते हैं। भजन-कीर्तन, लोकनृत्य, सामूहिक पूजा और भव्य आतिशबाजी के साथ यह महोत्सव ओडिशा की लोकसंस्कृति, आस्था और सामाजिक एकता का प्रतीक माना जाता है।
Panchu Dola Festival Banapur Odisha

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ओडिशा के खोरधा जिला के बाणपुर में ऐतिहासिक ‘पंचूडोला महोत्सव’ प्रारंभ हो गया है।  दोला पूर्णिमा (होली) के पांचवें दिन से आरंभ होने वाला यह महोत्सव ओडिशा की लोक परंपराओं, भक्ति और सामूहिक उत्साह का अनुपम संगम है जहां हजारों श्रद्धालु देवताओं की सजी-धजी पालकियों के जुलूस में शामिल होकर दिव्य आनंद ले रहे हैं।

‘पंचूडोला महोत्सव’ 1637 ईस्वी में बाबाजी गोवर्धन दास और नीतई साहू द्वारा शुरू किया गया था। शुरू में ये पांच प्रमुख शिव मंदिरों के देवताओं तक सीमित था लेकिन धीरे-धीरे अब यह महोत्सव 80 से अधिक मंदिरों और आसपास के गांवों के देवताओं से जुड़ गया है। इस दौरान रात भर चलने वाले जुलूस, घोड़ा नाचा, मेढ़ा नाचा, संकीर्तन और भजन-कीर्तन से वातावरण भक्ति और उत्साह से भर जाता है।

‘पंचूडोला महोत्सव’ प्रारंभ

ओडिशा के खोरधा जिले के बाणपुर में मनाया जाने वाला पंचूडोला महोत्सव राज्य के सबसे प्रसिद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजनों में से एक है। यह उत्सव हर वर्ष डोला पूर्णिमा (होली) के लगभग पांच दिन बाद आयोजित किया जाता है और तीन से लेकर पांच दिन तक चलता है। इस दौरान बाणपुर और आसपास के क्षेत्रों से हजारों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं और पूरे क्षेत्र में मेले जैसा वातावरण बन जाता है। यह आयोजन स्थानीय धार्मिक परंपराओं, सामुदायिक भागीदारी और सांस्कृतिक उत्साह का महत्वपूर्ण प्रतीक माना जाता है।

देवताओं की पालकी यात्रा में श्रद्धालुओं की भीड़

इस उत्सव का मुख्य आकर्षण देवताओं की बिमाना (पालकी) यात्रा है जो फूलों और रोशनी से सजी होती है। भक्त जयकारों, शंख-झांझ और ड्रम की धुन पर नाचते-गाते आगे बढ़ते हैं। देव सभा में सामूहिक पूजा, चचेरी भोग (रंग लगाना), दही-पखाला भोग, महास्नान और भव्य आतिशबाजी का आयोजन होता है। 80 गांवों के योगदान से करोड़ों के पटाखे फोड़े जाते हैं जो ओडिशा के सबसे बड़े आतिशबाजी शो के रूप में प्रसिद्ध है। ग्रामीण मेला में पट्टचित्र चित्रकला, टेराकोटा शिल्प, चांदी की ज्वेलरी और बच्चों के लिए मीरा बाजार जैसे स्टॉल लगे रहते हैं, जो स्थानीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूती प्रदान करते हैं।

सामाजिक सद्भाव का प्रतीक

यह महोत्सव लगभग 388 साल पुराना है। शुरू में यह पांच प्रमुख शिव मंदिरों के देवताओं तक सीमित था, लेकिन समय के साथ इसमें 80 से अधिक मंदिरों के देवता शामिल हो गए हैं। यह धार्मिक उत्सव होने के साथ वहां के सामाजिक सद्भाव का भी प्रतीक है। इसमें विभिन्न संप्रदायों और जातियों के देवता एक साथ आते हैं और ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ के सिद्धांत को साकार करते हैं। इस अवसर पर जाति-वर्ण की दीवारें टूटती हैं और शांति, समृद्धि, एकता की कामना की जाती है। इस वर्ष भी हजारों श्रद्धालु इसमें शामिल हो रहे हैं। इसका मुख्य आकर्षण रात के जुलूस, घोड़ा नाचा, मेढ़ा नाचा और संकीर्तन जैसे पारंपरिक नृत्य-संगीत होते हैं। देव सभा में सामूहिक पूजा, चचेरी भोग (रंग लगाना), दही-पखाला भोग, महास्नान और भव्य आतिशबाजी ने उत्सव को और भी रोमांचक बनाया।

साभार: एएनआई

Shruty Kushwaha
लेखक के बारे में
Shruty Kushwaha

पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J.), 2001. 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल और लाइव इंडिया मुंबई में कार्य.

2001 में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय भोपाल से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J, Masters of Journalism)। 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल, लाइव इंडिया मुंबई में कार्य अनुभव। साहित्य पठन-पाठन में विशेष रूचि। View all posts by Shruty Kushwaha →
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