
Tulsidas Jayanti
भक्तिकाल के महान संत-कवि गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती श्रद्धा, भक्ति और सांस्कृतिक उत्साह के साथ मनाई जा रही है। श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि पर मनाई जाने वाली जयंती रामचरितमानस के रचयिता को समर्पित है, जिन्होंने भगवान श्रीराम के आदर्शों को जन-जन तक पहुंचाया।
इस अवसर पर सीएम मोहन यादव ने उन्हें नमन किया है। उन्होंने कहा कि “संत शिरोमणि, भक्ति और मर्यादा के महाकवि, रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती पर सादर नमन करता हूं l मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के चरित्र के माध्यम से गोस्वामी जी ने जो मंगलकारी और शुभ दीप प्रज्वलित किया है, वह अनंतकाल तक जनमानस को आलोकित करता रहेगा।”
गोस्वामी तुलसीदास जयंती
गोस्वामी तुलसीदास 16वीं-17वीं शताब्दी के महान संत, कवि और रामभक्त थे। उनके जन्म वर्ष और जन्मस्थान को लेकर विद्वानों में अलग-अलग मत मिलते हैं। उनके जीवन का बड़ा हिस्सा काशी, अयोध्या और चित्रकूट जैसे रामभक्ति से जुड़े प्रमुख क्षेत्रों में बीता माना जाता है।
भक्तिकाल के महान कवि और संत
वे भारतीय भक्ति साहित्य के ऐसे महान कवि माने जाते हैं जिन्होंने भगवान श्रीराम के आदर्शों, भक्ति, मर्यादा और लोककल्याण के संदेश को आम जनमानस तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनकी सबसे प्रसिद्ध रचना ‘रामचरितमानस’ ने श्रीराम की कथा को लोकभाषा में जन-जन तक पहुंचाया और भारतीय समाज तथा संस्कृति पर गहरा प्रभाव डाला। इसकी भाषा और शैली ऐसी थी कि यह केवल विद्वानों तक सीमित नहीं रही, बल्कि गांवों और कस्बों से लेकर सामान्य परिवारों तक पहुंची।
गोस्वामी तुलसीदास को हनुमान चालीसा की रचना के लिए भी विशेष रूप से जाना जाता है। हनुमान जी की स्तुति में रचित यह काव्य आज भी करोड़ों श्रद्धालुओं की दैनिक धार्मिक आस्था का हिस्सा है। इसके अलावा विनय पत्रिका, कवितावली, गीतावली, दोहावली, जानकी मंगल, पार्वती मंगल और वैराग्य संदीपनी जैसी रचनाएं भी तुलसीदास की साहित्यिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। उनका साहित्य मुख्य रूप से अवधी और ब्रजभाषा में है। उन्होंने संस्कृत में उपलब्ध धार्मिक और आध्यात्मिक परंपरा को ऐसी लोकभाषा में अभिव्यक्त किया, जिसे सामान्य लोग आसानी से समझ और आत्मसात कर सकें। यही उनकी साहित्यिक विरासत की सबसे बड़ी विशेषताओं में से एक मानी जाती है।
पत्नी रत्नावली से संबंधित प्रसिद्ध कथा
तुलसीदास के जीवन से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा उनकी पत्नी रत्नावली से संबंधित है। विवाह के बाद वे अपनी पत्नी के प्रति अत्यधिक अनुरक्त थे। एक बार रत्नावली अपने मायके चली गईं। तुलसीदास को जब उनके मायके जाने का पता चला तो वे उनसे मिलने के लिए व्याकुल हो उठे। कहा जाता है कि तेज बारिश और रात के अंधेरे के बावजूद तुलसीदास अपनी पत्नी से मिलने के लिए निकल पड़े। पारंपरिक कथा के अनुसार, तुलसीदास रत्नावली से मिलने के लिए रात में तेज बारिश के बीच उनके मायके पहुंचे। वहां उन्होंने जिस चीज को पकड़कर ऊपर चढ़ने का सहारा लिया उसे रस्सी समझा, जबकि वह सांप था।
रत्नावली ने जब तुलसीदास को इस तरह रात में अपने पास आया देखा तो उन्हें अपने पति के इस अत्यधिक मोह पर अचरज में पड़ गईं। उन्होंने तुलसीदास को समझाते हुए कहा कि यदि उनका इतना ही प्रेम भगवान श्रीराम के प्रति होता, तो उनका जीवन आध्यात्मिक रूप से धन्य हो जाता। लोकप्रचलित पंक्तियां इस प्रसंग को इस प्रकार व्यक्त करती हैं:
“अस्थि चर्ममय देह मम, तामें ऐसी प्रीति।
तैसी जो श्रीराम में, होती न तौ भवभीति॥”
अर्थात, मेरे इस हाड़-मांस के शरीर के प्रति जितना प्रेम और मोह है, यदि उसका आधा भी भगवान श्रीराम के प्रति होता तो संसार के भय और मोह से मुक्ति मिल जाती।
रत्नावली के शब्दों ने तुलसीदास के जीवन पर गहरा प्रभाव डाला। कहा जाता है कि उन्होंने सांसारिक मोह का त्याग कर भगवान श्रीराम की भक्ति और साधना को अपने जीवन का केंद्र बना लिया। आगे चलकर उन्होंने रामकथा को लोकभाषा में जन-जन तक पहुंचाया और ‘रामचरितमानस’ जैसी महान कृति की रचना की।
संत शिरोमणि, भक्ति और मर्यादा के महाकवि, रामचरितमानस के रचयिता गोस्वामी तुलसीदास जी की जयंती पर सादर नमन करता हूं l
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के चरित्र के माध्यम से गोस्वामी जी ने जो मंगलकारी और शुभ दीप प्रज्वलित किया है, वह अनंतकाल तक जनमानस को आलोकित करता रहेगा।… pic.twitter.com/gpD7ufVTJf
— Dr Mohan Yadav (@DrMohanYadav51) August 19, 2026
पत्रकारिता में स्नातकोत्तर (M.J.), 2001. 2001 से 2013 तक ईटीवी हैदराबाद, सहारा न्यूज दिल्ली-भोपाल और लाइव इंडिया मुंबई में कार्य.

